संग्रहालय में रखी काली देवी की प्रतिमा के पास कपाल आकार का अनुष्ठानिक पात्र

काली, दुर्गा और भैरव की तस्वीरों में कपाल क्यों दिखता है? जानिए इसका मतलब

धर्म

कपाल क्या होता है और इसका इस्तेमाल किसलिए किया जाता है? आसान शब्दों में समझिए।

कपाल क्या है?

कपाल खोपड़ी से बना पात्र है। बौद्ध तंत्र और तिब्बती बौद्ध तंत्र (वज्रयान) में इसे अनुष्ठान के उपकरण या कटोरे की तरह इस्तेमाल किया जाता है।

कपाल शब्द कहां से आया?

यह शब्द संस्कृत के कपाल से आया है। इसका अर्थ खोपड़ी या माथा है, आमतौर पर इंसान का।

इसका उपयोग किसलिए होता है?

  • कपाल मुख्य रूप से गूढ़ यानी रहस्यमय कामों, जैसे अनुष्ठानों के लिए इस्तेमाल होता है।
  • हिन्दू धर्म में तांत्रिक साधक और अघोरी इसे अनुष्ठानों में उपयोग करते हैं।
  • तिब्बती मठों में इसमें प्रतीक रूप से तोरमा (रोटी या आटे के केक) और शराब रखी जाती है। ये धर्मपाल जैसे उग्र देवताओं को चढ़ावे के रूप में दिए जाते हैं।

कौन से देवता कपाल के साथ दिखते हैं?

हिन्दू धर्म में दुर्गा, काली और शिव, खासकर भैरव रूप में, कपाल के साथ दिखाए जा सकते हैं। गणेश को तिब्बती बौद्ध धर्म में महारक्त गणपति के रूप में अपनाया गया। वहां उन्हें खून से भरे कपाल के साथ दिखाया जाता है।

वज्रयान के कई देवता, जैसे महासिद्ध, डाकिनी और धर्मपाल, आमतौर पर बाएं हाथ में कपाल लिए दिखाए जाते हैं।

कापालिक कौन थे?

कापालिक परंपरा भारत में शैव धर्म का तांत्रिक और गैर-पौराणिक रूप थी। कापालिक शिव को समर्पित शैव साधकों का ऐसा संप्रदाय था, जो अब लुप्त है। यह 8वीं सदी ईस्वी तक पुराना माना जाता है।

और क्या जानना चाहिए?

खासकर तिब्बती बौद्ध धर्म में कपाल अक्सर नक्काशीदार होते हैं या कीमती धातुओं और रत्नों से सजाकर जड़े जाते हैं। यह उन उपकरणों में से एक है, जो इंसानी हड्डी से बनते हैं और जिन्हें तांत्रिक आकाश-अंत्येष्टि स्थलों पर पाते हैं।

हिन्दू धर्म में कपाल किन खास अनुष्ठानों में इस्तेमाल होता है, यह अभी स्पष्ट नहीं है। इसे कैसे तैयार या प्रतिष्ठित किया जाता है, यह भी अभी पता नहीं है।

सार यह है कि कपाल खोपड़ी से बना अनुष्ठान का पात्र है। इसका संबंध बौद्ध तंत्र, हिन्दू तंत्र परंपराओं और कुछ देवताओं के चित्रण से है।